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पुण्यहीन के लिए मर जाना उसके हाथ से मत मरना ऐसी मौत निंदनीय है – मुनिपुंगव सुधासागर जी महाराज

निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव नव तीर्थ प्रणेता 108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा है की  पुण्यहीन के लिए मर जाना उसके हाथ से मत मरना ऐसी मौत निंदनीय है।

सम्मान न कराना कोई बड़ी बात नहीं है,वो दूसरे का सम्मान देख नहीं सकता है जो तुम्हारे पास नहीं है जो जिसके पास है उससे ईर्ष्या भाव आ रहा है ये दुर्गण जिसके पास हैं उसके अच्छे दिन कभी नहीं आयेगे। गुणषु प्रमोदं।

मोक्ष में जाने वाले सब संसार में हैं, संसार के बारे में सोचना पड़ेगा संसार संभालो दुश्मन भी हो तो उसको संभालो,दुश्मन को मिटा नहीं सकते,10 पीढ़ी बाद दुश्मन पुन आ जाता है।दुश्मन बिना बीज की खेती हैं गाजरी घास है दुश्मन,दुश्मन को मिटाने का भाव नहीं करता दुश्मन जो करता है करने दो मेरे प्राण ले ले तो भी कुछ नहीं करूंगा मैं कुछ नहीं करूंगा दुश्मन को कुछ भी करें मैं कुछ नहीं करुंगा।

सृष्टि में रहने वालों की अच्छी व्यवस्था बनाई है मोक्ष जाने वालों के लिए जहां निश्चयनय से साधनभुत है, व्यवहार संसार के लिए साधन रूप है, निश्चय नय में मोक्ष की व्यवस्था होती है व्यवहार मे संसार की व्यवस्था है मोक्ष संसार की व्यवस्था बनाने वालों को भी सम्हालता हैं। बेटे के लिए मर जाना बेटे के हाथ से मत मरना ऐसी मौत निंदनीय हैं पुण्यहीन की यही तो सबसे बड़ी कमजोरी है कि वो पुण्यावान को देखकर जलता है,ईर्ष्या करता हैं जो वस्तु जिसके पास है जिसके पास नहीं है वह जिसके पास है उससे ईर्ष्या न करें।

शिक्षा-दुश्मन को मिटाने का भाव नहीं करना चाहे हमारा सब कुछ मिट जाये।दूसरे को देख कर नहीं जलना।

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