विचार

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

डॉ. हरीश जैन

भाषा मानव संप्रेषण का एक अप्रतिम साधन है। सामाजिक व्यवहार के विभिन्न रूपों और प्रकारों में भाषायी व्यवहार का एक प्रमुख स्थान है। अपने विविध व्यवहार – क्षेत्रों में भाषा प्रयोग की दृष्टि से कुछ भाषायी समुदाय एक भाषी होते हैं और कुछ समुदाय बहुभाषी। कई भाषायी समाज ऐसे हैं जो विशिष्ट प्रयोग-क्षेत्रों के लिए अलग-अलग भाषाओं का प्रयोग करते हैं। अपनी भाषा से इतर भाषाओं का विशिष्ट प्रयोग-क्षेत्रों में उपयोग प्रायः ऐसे समाजों में होता है जो समाज अथवा देश स्वाधीन नहीं होते और जहाँ शासक वर्ग अपनी भाषाएं उन पर प्रशासनिक कार्यों के लिए अथवा अन्य निश्चित कार्यों के लिए थोपता है। स्वाधीनता से पूर्व अपने देश में भी ऐसी ही स्थिति रही है जिसमें भारतीय भाषाओं को जीवन के विविध प्रयोग- क्षेत्रों में प्रयोग में प्रयुक्त होने और विकसित होने का अवसर नहीं दिया गया एवं शिक्षा,ज्ञान- विज्ञान,प्रशासन,वाणिज्य तथा व्यापार आदि में अंग्रेजी का ही प्रयोग किया जाता रहा।

 हिन्दी भाषा की उत्पत्ति और संवैधानिक स्थिति

हिंदी भाषा का जन्म लगभग 1000 ईस्वी में हुआ था लेकिन उसमे साहित्य रचना का कार्य सन 1150 के आस पास हुआ। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा सन 1917 में भरूच (गुजरात) में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा के रूप हिंदी को मान्यता प्रदान की गयी। 14 सितम्बर 1949 को सविधान सभा ने एकमत से हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने का निर्णय लिया और सन 1950 में सविधान के अनुच्छेद 343 (1) के द्वारा हिंदी के देवनागरी लिपि को राजभाषा का दर्जा दिया गया। हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए सन 1953 से 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

स्वाधीनता के उपरांत भारतीय भाषाओं का शिक्षा,प्रशासन तथा जनसंपर्क के विविध माध्यमों में प्रयोग किए जाने का निश्चय किया गया और इसलिए इन भाषाओं का सुनियोजित विकास करने का भी निश्चय किया गया। सर्वाधिक भारतीयों की भाषा होने के नाते हिंदी को केंद्रीय सरकार की राजभाषा का स्थान भी मिला। धीरे-धीरे हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर भी पहचान मिलने लगी।

26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ साथ राजभाषा नीति भी लागू हुई। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप है। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का प्रयोग भी सरकारी कामकाज में किया जा सकता है। अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत यह भी व्यवस्था की गई है कि संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक, अर्थात वर्ष 1965 तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए पहले की भांति अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग होता रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी कि इस बीच हिन्दी न जानने वाले हिन्दी सीख जायेंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सक्षम बनाया जा सकेगा।

अनुच्छेद 344 में यह कहा गया कि संविधान प्रारंभ होने के 5 वर्षों के बाद और फिर उसके 10 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे, जो अन्य बातों के साथ साथ संघ के सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में और संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खंड 4 के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 120 में कहा गया है कि संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है।

वर्ष 1965 तक 15 वर्ष हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी अंग्रेजी को हटाया नहीं गया और अनुच्छेद 334 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकती है। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भारत की राजभाषा है।

देश की स्‍वतंत्रता से लेकर हिन्‍दी ने कई महत्‍वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्‍त की हैं। भारत सरकार द्वारा विकास योजनाओं तथा नागरिक सेवाएं प्रदान करने में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

हिंदी के महत्त्व को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने बड़े सुंदर रूप में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था, ‘भारतीय भाषाएं नदियां हैं और हिंदी महानदी’। हिंदी के इसी महत्व को देखते हुए तकनीकी कंपनियां इस भाषा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं। यह खुशी की बात है कि सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्‍दी का इस्‍तेमाल बढ़ रहा है। आज वैश्वीकरण के दौर में, हिंदी विश्व स्तर पर एक प्रभावशाली भाषा बनकर उभरी है। आज पूरी दुनिया में 175 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा पढ़ाई जा रही है। ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकें बड़े पैमाने पर हिंदी में लिखी जा रही है। सोशल मीडिया और संचार माध्यमों में हिंदी का प्रयोग निरंतर बढ़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी हिन्दी की बढ़ती स्वीकार्यता को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है-

  • संयुक्त राष्ट्र ने भी हिन्दी में वेबसाइट बनाई है और हिन्दी में रेडियो प्रसारण भी शुरू किया है।
  • अमेरिका से हर सप्ताह विदेश विभाग की ओर से समसामयिक मुद्दों पर हिन्दी में संवाद किया जाता है।
  • भारत स्थित अमेरिकी दूतावास से हिंदी की मैगज़ीनस्पैन प्रकाशित की जाती है।
  • विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण किया जाता है। इसके लिए हिन्दी चेयर्स की भी स्थापना की गई है।
  • अमेज़न, फेसबुक, गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने भी हिन्दी के महत्व को स्वीकार किया है।
  • चीन सरकार ने भी हिन्दीमें वेबसाइट बनाई है और हिन्दी में रेडियो प्रसारण भी शुरू किया है।
  • विश्व भर में हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में पसंद किया जा रहा है।
  • विश्व की प्रमुख भाषाओं के साहित्य का हिन्दी में अनुवाद हो रहा है और साथ हीहिन्दी साहित्य का अनुवाद विदेशी भाषाओं में हो रहा है।
  • भारत का नमस्ते शब्द पूरी दुनिया में मशहूर है।
  • विश्व के अधिकांश देशों में हिन्दी सोसायटी, हिन्दी संस्थाओं का निर्माण हो रहा है।
  • विश्व के कई देशों में स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी हिन्दी पढ़ाई जा रही है।
  • आज विश्व भर में कई पत्र – पत्रिकाएं,बेवसाइट तथा ब्लॉग्स हैं,जो हिन्दी भाषी होकर हिन्दी का प्रचार – प्रसार बखूबी कर रहे हैं।
  • हर वर्ष विश्व के अलग-अलग देशों में विश्व हिन्दी सम्मेलन मनाया जाता है।
  • विश्व के कई देश अपने यहां हिन्दी शिक्षण के लिए अलग से धनराशि निर्धारित करते हैं।
  • यूनिकोड और हिंदी कम्पयूटिंग के क्षेत्र में विकास होना हिन्दी की अतंरराष्ट्रीयस्वीकार्यता की पहचान है।
  • हिन्दी मशीन अनुवाद को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोशिशें चल रही है।
  • ऑक्सफॉर्ड, सेज़ जैसे विश्व के विख्यात प्रकाशकों ने अपने हिन्दी प्रकाशनों का भी शुभारंभ किया है।
  • विश्व भर में मनोरंजन जगत में हिन्दी का बहुत उपयोग हो रहा है इसके लिए हिन्दी में सब-टाइटलटिंग, डबिंग, वॉयसओवर, कंटेट राइटिंग, फिल्म पटकथा लेखन, एनिमेशन फिल्म आदि जैसी तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है।
  • विश्वभर में भारतीय हिन्दी सिनेमा की अपनी एक पहचान है।
  • भारत के नेताओं और राजनयिकों द्वारा विश्व पटल पर हिन्दी में भाषण दिया जाता है।

सुप्रसिद्ध हिन्दी सेवी फादर कामिल बुल्के के तत्कालीन कथन पर दृष्टिपात हमें वर्तमान समय में जागरूकता की प्रेरणा बन सकता है |

उन्होंने कहा था –“हिन्दी भाषा इतनी समृद्ध, सक्षम और सरल है कि हमारा सारा कामकाज सुचारू रूप से हिन्दी में किया जा सकता है। यह खेद की बात है कि हिन्दी भाषियोंमें भाषा के प्रति स्वाभिमान नहीं जगा,अन्यथा बहुत पहले हिन्दी देशव्यापी स्तर पर प्रचलित हो गई होती। अचानक ही हिन्दी में कामकाज होना शुरू होने पर कुछ कठिनाइयां होना स्वाभाविक हैं। क्रमशः इनका निराकरण सम्भव हो सकता है। जब मैं बेल्जियम से भारत आया था तो भारतीय जनता में अपनी भाषा के प्रति घोर उपेक्षा पाई। यह देख कर मैंने हिन्दी पढ़ने का संकल्प लिया। मैंने निश्चय किया कि हिन्दी की सेवा करूंगा। भारत में संस्कृत मां है, हिन्दी ग्रहणी और अंग्रेजी नौकरानी। इस तथ्य को कोई स्वाभिमानी भारतीय कैसे भुला सकता है?”

जब हम विश्व पटल पर खड़े होकर देखते हैं तो पाते हैं कि विगत कुछ वर्षों से हिन्दी का वैश्विक मंच विशाल और समृद्ध होता जारहा है। भारत का संयुक्त राष्ट्र – संघ में हिन्दी की स्थापना का प्रयास, विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन आदि ऐसे कार्य हैं जिससे हिन्दी की वैश्विक क्षमता सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अब हिन्दी एकदेशीय नहीं अपितु बहुदेशीय भाषा का रूप ले चुकी है। इसलिए हमें इस वर्ष संकल्प लेना होगा कि हमें हिन्दी भाषा को और समृद्ध और लोकप्रिय बनाना है।

 

लेखक परिचय – डॉ. हरीश जैन भारतीय संसद में अनुवादक हैं और हिन्दी, पत्रकारिता तथा अनुवाद के जानकार हैं।

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