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महावीर निर्वाण कल्याणक“मैं” से स्वयं में जाना निर्वाण हैं- डॉ. निर्मल जैन (ret. Judge)

“ज्ञान और आलोक का उत्सव –दीपावली जैन विचारधारा के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर का निर्वाणोत्सव”। बनने और बिगड़ने, जन्मने और अंत को प्राप्त होने का क्रम अनादि काल से चला आ रहा है, चलता रहेगा। समुद्र की लहर आती है किनारे की रेत पर बनी रेखायें मिटा देती है। ऐसे ही जीवन भी अवतरित होता है और मृत्यु द्वारा काल-कवलित हो जाता है। निर्माण (सृजन) और निर्वाण यह दोनों प्रक्रिया कोई अलग नहीं है। लेकिन जाने क्यों हम निर्माण (सृजन) को देखकर प्रसन्न होते हैं और निर्वाण या मृत्यु को देखकर दुखी हो जाते हैं। जबकि निर्माण के लिए निर्वाण अपेक्षित है ।

साहित्यक भाषा मे निर्वाण का अर्थ बुझ जाने से है। अध्यत्मिक जगत में जब मन सभी आवृतियो और अवधारणाओ से मुक्त हो जाता हैं तो मोक्ष प्राप्त हो जाता हैं। धर्म में निर्वाण को तृष्णा का बुझ जाना, वासनाओं का शांत हो जाना है। भवचक्र में पड़ा हुआ प्राणी अनादिकाल से बार-बार जन्मता-मरता आया है। मोक्ष, मुक्त, निर्वाण यह सब पर्यायवाची हैं। सनातन हिन्दू जीवात्मा का परम चेतना में मिलन को मोक्ष मानता है। बुद्ध ने उसे मुक्ति कहा।

जिनदर्शन ईश्वर के कर्ता-रूप को नकारता है। जिनदर्शन में आत्मा सर्वोपरि है अर्थात आत्मोलब्धि ही निर्वाण है। जैनधर्म में निर्वाण का अर्थ है कर्म के आखिरी बंधन खोल देना। जब एक प्रबुद्ध मानव, एक अरहंत या तीर्थंकर अपने शेष अघातिया कर्म का नाश कर अपने सांसारिक अस्तित्व को समाप्त करता है, उसे निर्वाण कहा जाता है। तृष्णा और वासना-जनित दुःखों से पूरी तरह छुटकारे का नाम है- निर्वाण। “मैं” से स्वयं में जाना निर्वाण हैं।

हम दीपावली महावीर निर्वाणोत्सव के रूप में मनाते हैं। निर्वाण का अर्थ किसी ऐसे शीर्ष शिखर पर जाकर बसना नहीं है, जो संसार की ऊहा-पोह भरे सागर से ऊपर हो। निर्वाण, मन पर विजय है। जिसने मन पर काबू पा लिया उस पर समय के कालचक्र का नुकीलापन प्रभावी नहीं होता। महावीर संसार और सन्यास के जाल बुनने वाले मन से मुक्त होने के लिए वीतराग मार्ग पर आरूढ़ हुए। महावीर बनना है तो हम मन से शून्य बनें, उसे मांजने के चक्कर में ना पड़ें। हम अतीत हो जाएं मन से भी, शरीर से भी। ताकि स्वयं ही हमारे सामने जीवन की यथार्थता नजर आ जाए। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों पर लगाम कसें।

महावीर ने ही कहा है -यदि कुछ पाने की इच्छा है तो कुछ का त्याग करो। आवश्यकताओं की पूर्ति से अधिक अर्जन और संग्रह दोनों ही अनर्थ को निमंत्रण होगा। लेकिन हम ने आवश्यकताओं को इतना विस्तार दे दिया कि पूरी उम्र कमाते हैं फिर भी पूरा नहीं पड़ता। त्याग से जो प्राप्त होगा वह स्थिर रहेगा। यदि चाह सब कुछ पाने की है तो सब कुछ त्यागना भी पड़ेगा। मेरी (महावीर) की तरह सब कुछ ऐसा मिलेगा जिसकी कल्पना भी नहीं की होगी, बशर्ते त्याग मन से हो। यदि मन के कोने में हल्की-सी भी चाह रह गई तो कुछ नहीं मिलेगा।

आतंक, हिंसा का सहारा लेकर नैतिकता की सारी मर्यादाएं लांघती हुई वर्तमान मनोवृत्ति और मानव मूल्यों से किए जा रहे खिलवाड़ के दौर में यदि महावीर और महावीर के दर्शन के महत्व को नहीं समझा गया तो महाविनाश के लिए तैयार रहना चाहिए। भोगवादी संस्कृति के मोहपाश में बंधे आज हम किंकर्तव्यविमूड़ से एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जहाँ यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि -हिंसा और आतंक का मुखौटा पहने धार्मिक उन्माद, संग्रह के प्रति जुनून और पूँजीवादियों के शोषण के मार्ग पर ही चलते रह कर विनाश को प्राप्त होना है। या फिर महावीर का अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत, स्याद्वाद का वो मार्ग अपनाना है, जो मानव जीवन और पर्यावरण को स्वस्थ, सुंदर और खुशहाल बनाता है।

इसके लिए पहले हम खुद जीना सीखें फिर सब को जीने दें। तभी महावीर निर्वाण कल्याणक मनाने की सार्थकता है। अन्यथा दीप जलाना- लड्डू चढ़ाना और बांटना इस आध्यात्मिक पर्व को सांसारिक रूप देकर मात्र औपचारिकता निभानी होगी। Mob-9810568232

डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
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