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यदि आप किसी को प्रभावित करना चाहते है तो अपनेआपको सहज और सरल बना लो – मुनि श्रीसौम्यसागर जी महाराज

यदि आप किसी को प्रभावित करना चाहते है तो अपनेआपको सहज और सरल बना लो, यदि सहजता और सरलताआपके जीवन में आ गयी तो वह व्यक्ती आपसे प्रभावित हुये बिना नहीं रहेगा। उपरोक्त उदगार मुनि श्रीसौम्यसागर जी महाराज ने शीतलधाम विदिशा में पर्वराज पर्युषण के तीसरे दिवस उत्तम आर्जव धर्म के दिन प्रगट किये

सभा में मुनि श्री निश्चयसागर जी ने प्रश्न किया कि “सहज और सरल लोगों को ही अक्सर कठनाइयां झेलना पड़ती है,जब कि कुटिल और व्यसनी लोग आराम का जीवन जीते है”तथा जंगल में जो वृक्ष सीधे खड़े होते है वही,बृक्ष पहले काट दिये जाते है जबकि आड़े तेड़े वृक्षों को छोड़ दिया जाता है।?
जबाव देते हुये मुनि श्री ने कहा कि “सीधे वृक्षों की लकड़ी इमारती लकड़ी कहलाती है जो कि इमारतों में लगकर बहुत समय तक उपयोग में आती है,जबकि जो वृक्ष आड़े तेड़े होते है,वह जलाऊ कहलाती है, जो कि जलकर नष्ट हो जाया करती है, उसी प्रकार जो जितना सहज और सरल होता है,वह विश्वसनीय और प्रमाणिक माना जाता है, वह किसी को ठगता नहीं है, और यदि कभी वह ठगा जाता है तो वह स्वं संतोष करता है कि हमने जीवन में किसी को ठगा नही।

मुनि श्री ने कहा कि सत्य को प्रमाणित करने की आवशक्ता नहीं होती जबकि असत्य को प्रमाणित करना पड़ता है कि में सत्य हुं।उन्होंने महात्मा गांधी के जीवन की एक घटना सुनाते हुये कहा साऊथ अफ्रीका के आश्रम में रस परित्याग की चर्चा चल रही थी तो कुछ लोगों ने भावावेश में आकर एक माह के लिये नमक का त्याग कर दिया। “त्याग मन से किया जाता है तो वह फलीभूत होता है,लेकिन देखा देखी का जो त्याग होता है,वह अक्सर टूट जाता है।

बिना नमक के भोजन एक दिन हो तो चल जाऐ लेकिन किसी व्यक्ती की जिव्हा ने जब साथ नहीं दिया और चटपटा खाने को मचलने लगी तो उसने कुछ लोगों का साथ लिया और बाजार से भोजन बुलाकर खा लिया और कहा गया कि इस बात की चर्चा किसी से न की जाऐ।
लेकिन उनमें से एक व्यक्ती ने अपनी गल्ती को स्वीकार करते हुये गांधी जी से प्रायश्चित मांगा।
तो उन्होंने पूंछा कि बाजार से भोजन किसने बुलाया? जिसने गल्ती को स्वीकार किया वह भी किसी का नाम बताने तैयार नहीं होता “क्यू कि प्रमाणिकता और विश्वसनियता जिसकी छूट जाती है तो फिर कोई उस पर विश्वास नहीं करता”और नं.दो के काम में कभी बेईमानी नहीं होती, जितने भी बेईमान होते है वह सभी एक हो जाते है, मीटिंग वुलाई गई और जब किसी ने भी गल्ती को स्वीकार नहीं किया तो गांधी जी ने अपने हाथ से अपने ही दौनों गालों पर प्रहार करना शुरु कर दिया, तो आश्रम के ही एक भद्र पुरुष ने गांधी जी को रोकते हुये कहा कि गल्ति किसी की और ने की और सजा आप अपने आप को क्यों दे रहे?तो गांधी जी ने कहा कि “में सजा इसलिये अपने आपको दे रहा हूं कि “मेंआप लोगों के वीच सत्य और विश्वास को अर्जित नहीं कर पाया”
गांधी जी के इतना कहते ही बह व्यक्ती सामने आकर अपनी गल्ती को स्वीकार कर गांधीजी से माफी मांगता है।

मुनि श्री ने कहा कि आज का दिवस मायाचारी छोड़ने का दिवस है,हम भीतर से कुछ,और बाहर से कुछ और दिखाना चाहते है, पहले भारतीय परिधान मर्यादा का प्रतीक थी लेकिन आजकल तो उस परिधान में भी मायाचारी आ गई है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग तो अपने घर में भी सहज और सरल नहीं रह पाते और घर में ही क्लेश का वातावरण वना देते है,यदि आप अपने घर में स्वं सच वोलेंगे तो आपके बच्चे भी सच बोलेंगे। और बच्चा यदि सच बोलना सीख जाऐ तो समझना कि आपने अपने बच्चे को सभी संस्कार दे दिये। मुनि श्री ने कहा कि अपने आपको इतना सहज और सरल वना लो कि जैसे मां अपने वच्चे को ममता भरी निगाहों से देखती है और बच्चा दौड़ा चला आता है,उसी प्रकार लोग आपकी ओर खिंचे चले आऐ। उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये वताया मंच पर सभी मुनि विराजमान थे

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