RELIGIOUS

ज्ञान के साथ त्याग भी जरूरी -आचार्य श्री आर्जवसागर जी

पने जीवन को महान बनाने विनय, वात्सल्य,करूणा को धारण करो

आचार्य श्रीआर्जवसागर जी महराज ने अपने मंगल प्रवचन के दौरान संसार वृक्ष की कथा को सुनाते हुए बताया कि संसार में प्रत्येक आत्मा को परमात्मा बनने के लिए परमात्मा के स्वरूप को जानना आवश्यक होता है क्योंकि परमात्मा बनाए नहीं जाते अपितु वह तो पाषाण में प्रकट होते हैं।पाषाण में जो मूर्ति दिखती है उसमें जो अनावश्यक पदार्थ हो ता है उसे शिल्पकार अपने हाथों से हटाकर भगवान की प्रतिमा को प्रकट करता है। भगवान को कोई बना नहीं सकता। हमें भी भगवान बनने की शक्ति होती है। हमारे अंदर बैठी भव्यत्व रूपी आत्मा में अनंत शक्ति है। पुरुषार्थ करने से वह शक्ति प्रकट हो जाती है। वह शक्ति कहीं से खरीदी नहीं जा सकती, किसी से भी नहीं ली जा सकती वह तो स्वत: ही प्रकट होती है।

आचार्य श्री ने कहा कि  हमें निमित्त और उत्पादन दोनों की आवश्यकता होती है। अगर निमित्त ना मिले तो उपादान भी ना हो ।जिसकी जितनी ज्यादा विनय करोगे उसकी उतनी संपन्नता मानी जाती है। जो जितना ज्यादा देता है उससे दुगना प्राप्त करता है। यह विनय,वैया वृत्ति आदि जो भावनाएं हैं, वे तीर्थंकर प्रकृति के बनने में कारण बनती हैं।

आचार्य श्री ने कहा कि देव शास्त्र गुरु की सेवा और उनका समागम पाना बहुत ही पुण्य की बात है। उनका मिलना अपूर्वानंद की प्राप्ति का कारण है।

गुरूवर ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि पुस्तकीय ज्ञान ही सब कुछ नहीं होता; जिससे राग छूट जाए ,जिससे मोक्षमार्ग में रूचि जाग जाए, जिसके द्वारा मैत्री की प्रभावना हो, जिन शासन में उसे ही ज्ञान कहा जाता है। इसलिए बंधुओं! अपने जीवन में विनय, वात्सल्य ,करूणा, दया को धारण करके आत्मा के गुणों को प्रकट करो और उन गुणों से स्नेह करके संसार से विरक्त होने का मार्ग खोजो।

आचार्य श्री आर्जवसागर जी ससंघ बालाघाट मे विराजमान है।

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