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ग़ज़लों की महफ़िल आजकल थोड़ी फ़ीकी पड़ी है

दाद देने वाली भीड़ अब उस शायर को शब्दों के साथ स्वांग करतें दुबारा नही देख सकती अब उनकी कविताओं  सुना , पढ़ा और महसूस तो  किया जा सकता है पर उन कविताओं के साथ इंसाफ नही हो सकता।
अगर आप शायरी और कविताओं के सौखीं है तो अब तक आप यह समझ चुके होंगे की मैं राहत इंदौरी साहब की बात कर रही हूँ ।
राहत इंदौरी साहब का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर में हुआ ,अपने शहर से उनका लगाव कुछ ऐसा था की “राहत कुरैशी” नाम को छोड़ उन्होंने दुनिया को  राहत इंदौरी से मुख़ातिब करवाया ।
वेश भूषा से बिल्कुल साधार पर शब्दों में उनकी एक न एक व्यंग अक्सर सुनने को मिल जाती थी ।
मैं उनसे तब रूबरू हुई जब वह मेरे शहर के लोगो को अपनी कविताओं से रंगने आये थे वाक़या कुछ यूं हुआ कि उनसे जब सवाल पूछा गया की राहत इंदौरी बनने के लिए क्या करना पड़ता है ?
उनके जवाब ने सबको उनकी तरफ देखने पर मज़बूर कर दिया, उनका जवाब था ” इंदौरी बनने के लिए केवल हाव-भाव और कविता नही चाहिये , बरखुदार मूहँ भी काला करवाना होता है ” ।
कुछ ऐसे ही कुशल वयक्तित्व के साथ उनको मंच पर देखना शायरी प्रेमियों के लिए किसी इबादत जैसा था।
अफ़्सोस आज एक महान कवि हमारे बीच नही रहे पर उनकी रचनायें पीढ़ी दर पीढ़ी हमे उनकी याद दिलाती रहेगी ।
उन्हें याद करते हुए राहत इंदौरी की एक कविता जो हमे वर्त्तमान परिस्थिति से रूबरू कराती है ।
“अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है
जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे
जुबां तो खोल, नजर तो मिला, जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे
फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो”

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