विचार

सहज रूप में ज्यादा से ज्यादा सहज बनें 

एक सूक्ति है महावीर और राम अगर सौ बार भी जन्म लेंगे तो उससे क्या होता हैजब तक वह हमारे भीतर पैदा नहीं होते।  सरलता से होंगे भी नहीं क्योंकि हमने अपने मन के अंदर उन्हें  जन्म देने या उन्हें प्रतिष्ठित करने लायक जगह छोड़ी ही नहीं है। वहां विषय-कषाय के कूड़ा-करकट के कारण पहले ही ओवरलोडिंग” की समस्या बनी हुई है। सर्वत्र अहंकार की ही दुर्गन्ध है। यह अहंकार इतना सशक्त है कि उसके पैठते  ही फिर किसी अन्य के लिए जगह ही नहीं बचती। अहंकार की छाया ज्ञान के हर प्रकाश को धुंधला कर देती है।

संपूर्ण विश्व में पाप की अनेक किस्में हैं। धोखा, चोरी, लूट, ठगी, हिंसा, हत्या, ढोंग, शोषण, झूठ, छल और विश्वासघात आदि अनेकानेक पाप गिनाए जा सकते हैं। इन सभी के दो प्रमुख कारण हैं। पहला अहंकार और दूसरा अवमान। अहंकार का फल क्रोध और अवमान का प्रतिफल लोभ को जन्म देता है। अहंकार और अवमान आध्यात्मिक पाप हैं, जिनके कारण विभिन्न प्रकार के मानसिक, शारीरिक व सामाजिक पापों का जन्म होने लगता है। अहंकार वह पाप है जिसमें व्यक्ति अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है। वह चाहता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें। जब इसमें कोई कमी आती है, तो वह अपमान समझकर क्रोध से भर उठता है। वह नहीं चाहता कि कोई मुझसे धन में, प्रतिष्ठा में आगे हो। वह जिस किसी को सुखी-गुणसंपन्न देखता है उसके प्रति ईर्ष्या का भाव प्रकट करता है। अहंकारी को न तो अपनी गलतियाँ दिखाई देती हैं न ही दूसरों के गुण।

अहंकारी अपने हर एक कृत्य का प्रमाण पत्र चाहता है। प्रशस्ति मांगता है। फल की यह आकांक्षा अहंकार की ही मांग है। अहंकार आसुरी संपत्ति-संपन्न व्यक्ति का चिन्ह है। अपनी दुर्बलता और हीनता के भाव को छुपाने का उपाय है। सांसारिक मामलों के साथ आजकल धार्मिक क्षेत्र में भी अहंकार की गहरी घुसपैठ हो गयी है।

         पाप नि:संदेह बुरा है लेकिन उससे भी बुरा पुण्य का अहंकार है। अज्ञानी आत्मा पाप करके भी अहंकार करता हैं– तीर्थंकर महावीर

प्राय अहंकारी अपने अहंकार को गर्व के रूप में प्रस्तुत करके समान्य जन-मानस को भ्रमित करता रहता है। गर्व और अहंकार में स्पष्ट अंतर है। अहंकार असंवेदनशील है। जब भी गर्व में नम्रता और सजगता का लोप हो जाता है तो वह अहंकार बन जाता है। अगर गर्व के साथ सेवा और प्रेम भाव नहीं है अपितु कुछ किए जाने का प्रदर्शन है तो वह गर्व नहीं अहंकार है।

तुम्हारे लिए धर्मपुस्तकदेवालय और प्रार्थना की कोई आवश्यकता नहींयदि तुमने अहंकार त्याग दिया है। – स्वामी विवेकानन्द

हम जितना अहंकार को “डेकोरेट” करके रखते हैं उतनी ही कहीं ज्यादा चोट हमे उससे मिलती है। गाली केवल बोले गए शब्द ही तो हैं लेकिन अहंकार के प्रभाव से गाली हमें आहत कर जाती है। अगर अहंकार विराजमान ना होता तो गाली हमें बिना छुए  अन्य ध्वनियों की तरह ब्रह्माण्ड में विलीन हो जाती। -उपाध्याय श्री गुप्ति सागर जी।

अहंकार रहित शीश जब झुकता है तब आशीष भी मिलता है और ईश भी मिलते हैं। इसके लिए कोई ज्यादा कुछ नहीं करना भी नहीं पड़ता, न कोई श्रम न कोई खर्चा। बस एक ही मार्ग है पद के  अहंकार और धन के  मद से दूर सामान्य रहें, सरल रूप में मिलें। बस थोड़ा सा और, वो यह कि सहज रूप में ज्यादा से ज्यादा सहज बनें

 

डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
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