NATIONAL POLITICAL विचार

शिक्षक दिवस 2020: जानिए डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन से जुड़ी कुछ खास बातें

यदि कोई देश को भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर मन वाले लोगो का राष्ट्र बनाना है, तो मुझे दृढ़तापूर्वक मानना है कि तीन प्रमुख सामाजिक सदस्य हैं जो ये कर सकते है – वे है पिता, मां और शिक्षक ।

                                                                                                                                                                                                                                                              -ए पी जे अब्दुल कलाम

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। लेकिन उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति होने से पहले, वह एक शिक्षाविद, दार्शनिक और बीसवीं शताब्दी के भारत के सबसे प्रसिद्ध शिक्षकों में से एक थे। भारत में 58 सालों से हर साल 5 सितंबर को डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस ही एक रूप से गवाह है की वह कितने महान अध्यापक रहे होंगे।

तो चलिए आज हम उनके जीवन से जुड़े कुछ हिस्सों को जानते हैं:
  • 5 सितंबर, 1888 ही वह तारीख है जब  तमिलनाडु के तिरुत्तानी, और इस देश में एक महान शिक्षक ने जन्म लिया था। उनके पिता और माता का नाम सर्वपल्ली वीरस्वामी और सीताम्मा थे। उनका विवाह शिवकामु नाम की लड़की से हुआ था और वह पांच बेटियों और एक बेटे के पिता थे।
  • उनको उनके अकादमिक जीवन के दौरान, उन्हें छात्रवृत्ति से सम्मानित किया गया था। उन्होंने वेल्लोर में वूरहिस कॉलेज में दाखिला लिया था लेकिन बाद में वे 17 साल की उम्र में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज चले गए थे । 1906 में उन्होंने दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री पूरी की और प्रोफेसर बन गए।
  • उन्हें 1931 में सर का ख़िताब मिल गया था और तब से स्वतंत्रता के प्राप्ति तक, उन्हें सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के रूप में संबोधित किया गया था। लेकिन आजादी के बाद उन्हें डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से जाना जाने लगा। 1936 में, उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्मों और नैतिकता के स्पेलिंग प्रोफेसर के रूप में नामित किया गया था। साथ ही, वह ऑल सोल्स कॉलेज के फेलो के रूप में चुने गए थे।
  •  1931-1936 तक, वह आंध्र विश्वविद्यालय में कुलपति थे, और 1939-1948 तक, वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कुलपति यानि वाईस चांसलर थे। और , 1953-1962 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में कुलपति रहें।
  • वह 1946 में संविधान सभा के लिए चुने गए थे। उन्होंने यूनेस्को और बाद में मास्को में राजदूत के रूप में भी कार्य किया।
  • 1952 में, वह भारत के पहले उपराष्ट्रपति बने और 1962 में, वे स्वतंत्र भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने थे।

 

  •  1954 में भारत रत्न  और 1954 में, उन्हें जर्मन “ऑर्डर पी ले ले माइट फॉर आर्ट्स एंड साइंस” और 1961 में जर्मन बुक ट्रेड का शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • 1963 में, उन्हें ऑर्डर ऑफ मेरिट भी मिला और 1975 में, “भगवान की एक सार्वभौमिक वास्तविकता जो सभी लोगों के लिए प्यार और ज्ञान को गले लगाती है” की धारणा को बढ़ावा देने के लिए टेम्पलटन पुरस्कार  सम्मानित किया गया था। और कमाल की बात यह है कि उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को पूरी पुरस्कार राशि दान कर दी थी।
  • जब वह कलकत्ता विश्वविद्यालय में शामिल होने के मैसूर विश्वविद्यालय छोड़ रहे थे; तब मैसूर विश्वविद्यालय के एक  छात्र ने उन्हें फूलों से सजी गाड़ी में स्टेशन छोड़ा था।
  • उनकी याद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में राधाकृष्णन शेवनिंग स्कॉलरशिप और राधाकृष्णन मेमोरियल अवार्ड की शुरुआत की गयी थी।
  • डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सिर्फ एक महँ अध्यापक ही नहीं बल्कि एक  महान पुरुष भी थे, उन्होंने बुज़ुर्ग लोगों की सेवा के लिए हेल्पेज इंडिया नाम के एक गैर लाभकारी संगठन की भी स्थापना की थी।
  • 1962 से सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मानाने का फैसला किया गया।
  • और उन्होंने अपना सारा जीवन देश के कार्य और हित के नाम कर दिया।
  • 17 अप्रैल, 1975 को इस देश ने एक महा पुरुष को खो दिया था।
उन्होंने शिक्षक और ज्ञान को एक नया रूप दिया था।  शिक्षक वह जो आपको सिखाये चाहे वह आपके माँ बाप या कोई दोस्त ही क्यों न हो।  हर ज्ञान देने वाला व्यक्ति एक शिक्षक है।  एक शिक्षक अपनी साड़ी ज़िन्दगी हर किसी को महान और शिक्षित करने में व्यतीत कर देता हैन।
कभी सोचा है अगर शिक्षक नहीं होते तो क्या होता ?

Leave a Reply

Your email address will not be published.