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ये तेरी बस ये मेरी बस, बेचारा पदयात्री मजदूर चारों ओर से बेबस -अशोक कुमार

पिछले दिनों उत्तरप्रदेश में बसों को लेकर जो राजनीति हुई,वह काफी दुखदायी और निराशाजनक बात रही। देश प्रदेश भर के लोग इससे दुखी हुए। हां भक्तों को कुछ राहत जरुर मिली होगी कि हमने कांग्रेस की ओर से भेजी गई बसों में नहीं जाने दिया। चले जाते तो कांग्रेस का गुनगाण करते। उनके नजरिये से देखा जाये तो शायद मौका आने पर कांग्रेस को वोट भी देते। या शायद बसों में बैठते ही ईवीएम का बटन दबा देते और कुछ समय बाद होने वाले चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ मतदान कर देते। कोरोना जैसी महामारी के दौर में तेरी बस मेरी बस जैसी राजनीति हो, तो इससे बड़ा दुर्भागय देश का और क्या हो सकता है कि हम मुसीबत की घड़ी में भी दूसरे को नीचा दिखाने का मौका नहीं चूक रहे।

यही इस देश की विंड़बना है। ऐसे ऐसे लोगों को राजनीति में आगे बढऩे का अवसर मिल जाता है जो कल तक समाज सेवा का दिखावा करते थे और आज समाज के साथ होने की बात करके भी साथ नहीं हैं। योगी आदित्यानाथ जब तक मुख्यमंत्री नहीं बने थे, उनकी एक अलग ही तरह की छवि थी कि वह बहुत भले और मदद करने वाले साधू प्रवृति के आदमी हैं। मगर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही शायद वह भी साधूत्व छोडक़र पूरी तरह से राजनीतिज्ञ बन गये हैं। इसी लिए उन्हें भी उन लाखों करोड़ों पैदल चल रहे मजदूरों, उनके परिजनों खासकर बूढ़ों, बच्चों और गर्भावस्था में भी मीलों चल रहीं औरतों की पीड़ा का अहसास नहीं हुआ। महात्मा होते तो उन्हें बिना कहे यह अनुभव होता और सबकी पीउ़ा का आभास हो जाता। जैसा कि मुख्यमंत्री बनने से पहले तक होता आया था।

अब सीधे मुद्दे पर पर आते हैं। कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने पैदल चल रहे मजदूरों की पीड़ा का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पिछले दिनों एक हजार बसें भेजने की इजाजत मांगी ताकि सरकार उन बसों का इस्तेमाल करके मजदूरों को उनके घरों तक भेज सके। मगर योगी सरकार और उनका पूरा प्रशासन इन बसों का इसतेमाल करने की बजाये इस बात पर अपना ध्यान लगाता रहा कि कैसे इन बसों में खामियां निकाल कर इन्हें इस्तेमाल न किया जाये। बाद में करीब 879 बसों को ठीक पाकर बाकी में तरह तरह की खामियां बताते हुए सभी बसों को इस्तेमाल करने से मना कर दिया गया और ऐसा प्रयोजित तरीके से प्रदर्शित करवाया गया कि सारी गलती प्रियंका गांधी की और कांग्रेस की है। यहां बात नीयत की आती है जोकि ठीक किसी भी तरह से नजर नहीं आती। आपको बसों में खामियां नजर आ गईं,मजदूरों की तकलीफ नजर नहीं आई। क्या वे कांग्रेस को बसों में बैठते ही वोट करने जा रहे थे। या बसों के इस्तेमाल होने से उत्तरप्रदेश की सरकार गिर रही थी।

फेसबुक पर कुछ लोगों के इस मामले में की गई टिप्पिणयां देख रहा था। उसमें कुछ दिव्यांग लोगों ने सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए अपने अपने दोपहियां अथवा तिपहियां वाहनों की भी पेशकश की कि सरकार इनका इस्तेमाल करके मजदूरों को उनके घरों तक भिजवाने का काम करे। क्या उत्तर प्रदेश सरकार दिव्यांगों से सबक नहीं ले पाई। अगर किसी तरह का डर मन में था तो सीधा कहते कि अगर कांग्रेस सच में यह सिर्फ जनसेवा के लिए कर रही है तो इस पर कांग्रेस का किसी तरह का कोई चिन्ह नहीं होगा और न ही कांग्रेस इसका कोई लाभ लेगी। कम से कम हजारों लाखों उन मजदूरों को तो राहत मिल जाती जोकि आज भी पदयात्रा ही कर रहे हैं और योगी जी,उनकी सरकार व उनकी पार्टी को भूखे प्यासे कोस रहे हैं। कम से कम योगी आदित्यनाथ जैसे महात्मा से तो इस तरह के व्यावहार की कल्पना नहीं थी।

अब बात करते हैं कांग्रेस की। ओछापन दिखाने में इस पार्टी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। जब इनकी बसें उत्तर प्रदेश में सरकार ने नहीं चलने दीं तो इस पार्टी ने भी अपना असली रंग दिखा दिया। राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने कोटा से उत्तर प्रदेश के लिए युवकों को अपनी बसों में भेजने का लाखों रुपये का बिल थमा दिया। बच्चे थे, मुसीबत में फंसे थे तो आपने मदद कर दी। उत्तर प्रदेश सरकार ने आपकी बसें मजदूरों को उनके घरों तक भेजने के लिए नहीं चलने दी तो यह उनकी अकल और सियास्त थी,लोग देख रहे थे और उस पार्टी की फजीहत हो रही थी। मगर आपने किराये का बिल मांग कर अपनी फजीहत करवाकर हिसाब बराबर करवा लिया। भाजपा ने कांग्रेस के रणदीप सुरजेवाला, सचिन पायलट जैसों को बोलने का मौका दिया तो कांग्रेस ने संबितपात्रा जैसों को अपनी भड़ास निकालने दी।

लिखक परिचय:- अशोक कुमार एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और उन्होंने चंडीगढ़ में हिंदी भाषा के दैनिक समाचार पत्रों और सप्ताहांतों में 35 वर्षों तक काम किया है। अब वह पिछले 6 वर्ष से अपना साप्ताहिक टैबलॉयड, “ट्राइसिटी रिपोर्टर” चला रहे है।

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