HEALTH

युवावस्था में स्‍मार्टफोन देना यानि बीमारियों को आमंत्रण – डॉ.अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

कभी कभी चिंतन करता हूँ कि यदि हमारे जमाने में यानी 50 वर्ष पहले टेलीविज़न, के बाद मोबाइल, इंटरनेट सुविधाएँ होती तो पता नहीं इतना कुछ कर पाते। उस ज़माने में सुविधाओं के साथ आर्थिक विपन्नता होने से पढाई ही एक मात्र लक्ष्य रहता था। उस समय रेडियो ही एक मात्र मनोरंजन का साधन रहा।  वर्ष 1962 के बाद टेलीविज़न की शुरुआत  हुई और 1990 के बाद अनेक चैनलों का चलन बढ़ा और बढ़ते बढ़ते यह स्थिति हो चुकी कि क्या देखे और क्या न देखे।

इसके बाद दुनिया अपनी मुठ्ठी में ने मोबाइल और इंटरनेट क्रांति आने से दुनिया एक छोटा गांव बन गया। सब सुविधाएँ मिलने से जानकारी उपयोगी और अनुपयोगी उपलब्ध होने लगी। टेलीविज़न के बाद मोबाइल से समय नष्ट होने का प्रतिशत बढ़ा।
अक्‍सर बच्‍चे घंटों तक मोबाइल फोन में ही घुसे रहते हैं। अब तो उनकी पढ़ाई, दोस्‍तों से बात और खेलकूद भी फोन में ही हो जाता है, लेकिन आपको समझना चाहिए युवा  बच्‍चों के लिए स्‍मार्टफोन नुकसानदायक होता है।
आजकल मोबाइल फोन तो खाना खाने और सोने से भी ज्‍यादा जरूरी हो गया है। अब स्‍कूल जाने वाले बच्‍चों के पास भी स्‍मार्टफोन रहने लगा है। विशेषज्ञों का  भी ये मानना है कि बच्‍चों को युवावस्था  ही मोबाइल  फोन थमा देना उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए ठीक नहीं है।

जी हां, अगर आपने भी अपने युवा बच्‍चे को मोबाइल फोन दे रखा है तो ये उसकी सेहत को बुरी तरह से नुकसान पहुंचा सकता है। यहां हम आपको युवाओं में  स्‍मार्टफोन इस्‍तेमाल करने से होने वाले नुकसानों के बारे में बताने जा रहे हैं।
यदि बच्‍चों को कम उम्र में ही मोबाइल दे दिया जाए तो जाहिर सी बात है कि उन्‍हें मैसेज टाइप करने की लत तो लग ही जाएगी। वहीं ज्‍यादा मैसेज टाइप करने से बच्‍चे को टीन टेंडोनाइटिस यानी टीटीटी हो सकता है। इसमें गलत पोस्‍च्‍र के कारण हाथ, पीठ और गर्दन में दर्द हो सकता है। इसके कारण नजर भी प्रभावित हो सकती है।

तनाव

पूरा दिन फोन पर लगे रहने और मैसेज करने वाले बच्‍चे बाहर दोस्‍तों के साथ घूमने और खेलने बहुत कम ही जाते हैं। अध्‍ययनों की मानें तो फोन पर ज्‍यादा समय बिताने वाले बच्‍चों में थकान और तनाव का खतरा रहता है। कुछ मामलों में मानसिक विकार भी हो सकते हैं।एक प्रकार से अंतर्मुखी होते जा रहे हैं। आजकल बच्चे माँ बाप के साथ किसी भी दोस्त या नाते रिश्तेदारों के यहाँ जाना पसंद नहीं करते और उन्हें बोरिंग होने लगती हैं।

नींद न आना

अधिकतर बच्‍चे सोते समय मोबाइल फोन को अपने पास ही रखते हैं। फोन बजने पर बार-बार नींद टूटती है और इससे बच्‍चे में नींद की कमी की समस्‍या होने लगती है।

कैंसर का खतरा

अध्ययनों  में सामने आया है कि मोबाइल फोन से निकली इलेक्‍ट्रोमैग्‍नेटिक रेडिएशन लंबे समय तक फोन को पकड़े रहने पर ऊतकों द्वारा सोख ली जाती हैं युवावस्था में  तंत्रिका तंत्र का विकास हो रहा होता है और इनमें वयस्‍कों की तुलना में मोबाइल फोन के कारण ब्रेन कैंसर होने का खतरा ज्‍यादा रहता है।

चिंता

किसी से बात करने के अगर मैसेज करना ही एकमात्र तरीका रह जाए तो इस वजह से युवा बच्‍चों में चिंता पैदा हो सकती है। दोस्तों को तुंरत उत्तर आना जहां खुशी देता है, वहीं घंटों इंतजार करने से चिंता बढ़ाती है।
युवाओं  के लिए मोबाइल फोन से सावधानियां

बच्‍चे को मोबाइल फोन देने से पहले ये तय कर लें कि उसे दिन में कितना समय और पैसा खर्च करना है।

उसे हिदायत दें कि दोस्‍तों के तुंरत जबाव का  इंतजार करना उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं है।

पढ़ाई करते समय मोबाइल फोन को बंद रखें।

सोने से पहले भी फोन को ऑफ करने की आदत डालें।

बच्‍चे को समझाएं कि फोन का कम इस्‍तेमाल करने से कैंसर के जोखिम को कम किया जा सकता है। दिन में 20 मिनट से फोन पर बात करना उसके लिए सही नहीं है।

बच्‍चों के लिए मोबाइल फोन का कम इस्‍तेमाल करने की बात समझना मुश्किल है, लेकिन पेरेंट्स होने के नाते आपको तो इस चीज को हल्‍के में नहीं लेना चाहिए।

यहाँ एक सुझाव देना उपयुक्त होगा जब तक बच्चे स्वावलम्बी न हो जाए उन्हें मोबाइल न दिया जाय ,पर युग के अनुसार न देना पुरातनपंथी और बैकवर्ड माना जाता हैं पर एक बार अबोध बालक के मन में इसका उपयोग शुरू करना ,उससे उसकी लत पड़ना। इससे उसका चक्रव्यूह से निकलना कठिन हो जाता हैं।

आजकल एकल परिवार होने से उनकी मांग पूरी न करने से या अन्यों की देखदेखि के कारण न देना कभी कभी गंभीर अप्रिय घटना का होना सामान्य बात हो गयी। एक तरफ जानकारी मिलना और दूसरी तरफ गलत आदतों का शिकारी होना कौन कितना लाभप्रद हैं। भविष्य तो उनका उसी में बीतना हैं।

समझदारी में ही सुखद भविष्य निहित हैं। वैसे इस रोग से आज कोई नहीं बच प् रहा हैं। बचाव स्वयं का करना हैं ,कारण भोगना ही व्यक्तिगत होगा।


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