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यदि भगवान की पूजा पूर्ण श्रद्धा भाव की जावे तो वह अलौकिक सुख के साथ आपके मन के अंदर चल रहे द्वंद को समाप्त करती है – मुनि श्री समता सागर जी

“जे नर पूजा करत है, ते नर इन्द़ समान, मनुष्य मजूरी देत है तो क्यों न दे भगवान” उपरोक्त उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने ओन लाईन जैन तत्व वोध की कक्षा को सम्बोधित करते हुये व्यक्त किये।

उन्होंने कहा कि यदि भगवान की पूजा पूर्ण श्रद्धा भाव से की जाऐ तो वह आलौकिक सुखों की पूर्ति के साथ आपके मन में चलने वाले अंतर द्वन्द को, समाप्त करती है। पूजा, अभिषेक और शांतिधारा भले ही आप दूसरे के के लिये कर रहे हो, दूसरों के भले का सोचोगे तो आपका भला तो होगा ही होगा।

मुनि श्री ने कहा कि अपने और अपने परिवार के हित में तो सभी सोचते है, लेकिन जो लोग ऐसी भावना भाते है कि सभी लोग स्वस्थ्य रहें, लोक कल्याण की भावना से भाई हुई भावना स्वं के लिये भी हितकारी होती है।
यदि कोई इस कोरोना रोग से पीडि़त हो ही गया है, तो वह भी अपने अंदर उस भगवान के प्रति जिसके प्रति उसकी निष्ठा है, उनका स्मरण करते रहें, तो आपके अंदर के भाव विचलित नहीं होंगे एवं अंतरद्वंद से बच जाएंगे। एक

प्रश्न- “शांतिमंत्रों के साथ यदि कोई त्यागी वृति अभिषेक और शांतिधारा किसी के स्वस्थ होंने की कामना से करता है तो उसका प्रभाव पड़ता है क्या?

तो मुनि श्री ने जबाव देते कहा कि निश्चित करके पड़ता ही पड़ता है, और उसकी भाव विशुद्धि तो होती ही होती है, दूसरों के निमित्त से यदि आप अच्छी भावना भा रहे हो तो आपके परिणाम तो विशुद्ध होंगे ही होंगे।
उन्होंने अभिषेक के प्रकारों को बताते हुये कहा कि तीर्थकंर भगवान के जन्म के समय जो अभिषेक किया जाता है,वह जन्माभिषेक,उसके बाद दूसरा राज्या भिषेक, और तीसरा दीक्षाभिषेक कहलाता है।

यह तीनों अभिषेक का जल गंधोदक नहीं कह लाएगा।

लेकिन दीक्षा के उपरांत जब भगवान को कैवल्यज्ञान की प्राप्ती हो जाती है,और मोक्ष हो जाता है,ऐसी जिन प्रतिमाओं का जो कि पाषाण या धातुओं की खड़गासन या पदमासन होती है, जिनका पंचकल्याणक होकर प्रतिष्ठा मंत्रों के साथ प्रतिष्ठा हो जाती है उन प्रतिमाओं का अभिषेक मनुष्यों के द्वारा किया जा रहा है,वह जिनाभिषेक कहलाता है, और वह अभिषेक का जल ही गंधोदक है।उस गंधोदक को लगाने से आपका जीवन भी भगवान के गुणों से सुगंधित हो जाता है। मुनि श्री ने कहा कि साक्षात भगवान को तो कोई छु ही नहीं सकता है,
हां आपको जिनालयों में आकर इन मूर्तियों को छूने का और अभिषेक तथा पूजन करने का अधिकार है, उन्होंने कहा कि यह पूजन यंहा पर ही नहीं चलती बल्कि स्वर्ग में भी जितने अकृत्रिम जिन चैत्यालय है, उन सभी में यह अभिषेक होता है,
जैसे ही यह जीव स्वर्ग में पहुंचता है, तो वहा के रहने वाले परिचारक गण वहा की व्यवस्था को बताते है, एवं वहा के भवनों पर रहने वाले देव अभिषेक और पूजन को करते है।

प्रश्न- क्या सम्यक् दृष्टि देव और मिथ्यादृष्टि देव दौनो ही अभिषेक करते है ?

जवाब देकर मुनि श्री ने कहा कि सम्यक् दृष्टि जीव उसे धर्म मानकर एवं मिथ्यादृष्टि जीव उसे परंपरागत मानकर कर करता है। उन्होंने कहा कि जो लोग यह सोचते है कि प्रतिमा का अभिषेक मात्र साफ सफाई के उद्देश्य से किया जाता है, उनकी सोच गलत है। प्रतिमा का अभिषेक मनुष्यों के द्वारा धर्म आराधना के लिये किया जाता है,और यह पूजा का एक अंग है। यथार्थ में तो प्रतिमा मंत्रों से प्रतिष्ठित हो गई उसकी शुद्धता की आवश्यकता ही नही है, वह तो हमेशा ही पूज्य है लेकिन हमारे आपके स्पर्श से एवं धूल के कण उस पर आ जाते है,तो वह भी निकल जाते है, एवं जब आप उनका प्रतिदिन जलाभिषेक करते हे, तो वह आपके गंधोदक बन जाता है, जो आपके अष्टकर्म का नाशक होता है। समाज में सभी का महत्व होता है, जैसे मशीन का कोई भी पार्ट छोटा नहीं माना जाता,एक छोटा सा भी पार्ट यदि खराब हो जाए तो वह मशीन काम नहीं करती, उसी प्रकार समाज के छोटे से छोटे व्यक्ती का महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता है। आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज हमेशा उदाहरण दिया करते है, कि पूरी साईकल नई है टायर ट्यूब सभी नये है, उस साईकल के टयूब में हवा भरी जा रही है लेकिन उसके ट्यूब का वह छोटा सा वाल्व यदि सही नही है, तो उसमें हवा ठहर नही सकती। उसी प्रकार आपका स्वाध्याय तो ऐसा होंना चाहिये कि आपके अंदर वह ठहर जाए। इसलियेअपने ज्ञान के इस वाल्व ट्यूब को चैक प्रश्नोत्तरी के माध्यम से ही चैक किया जा सकता है।
जिससे आपसे जो तत्काल प्रश्न पूंछे जाए तो आप जवाव दे सकें।

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