विचार

मानसिक संकीर्णता का परिचय- Indian Medical Association और Ayush मंत्रालय का विवाद -डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

बुद्धिजीवी मेडिकल एसोशिएशन की मान्यता हैं की पूरे विश्व के साथ भारत में आधुनिक चिकित्सा का वर्चस्व रहे और होना भी चाहिए। कारण एलॉपथी सरकार की दत्तक पुत्र होने से मुख्य धारा से जुडी हैं। और कहावत हैं मूल से ब्याज अधिक प्यारा होता हैं। इन  बुद्धिजीवी को जन्म के समय से ही देशी दवाएं दी गयी थी ,जैसे शेर मांसाहारी होने के बाद भी वह अपने बच्चे को दूध ही पिलाती हैं ना की खून पिलाती हैं।

आयुर्वेद को समझने के लिए आयुर्वेद की विचारधारा को समझना होगा। आयुर्वेद जड़ी बूटी का शास्त्र नहीं हैं बल्कि यह एक जीवन पद्धति हैं जिसके द्वारा आप अपनी जीवन किस प्रकार सुखद और शांतिकारक बना सकते हैं। आयुर्वेद दो शब्दों से बना हैं आयु और वेद। आयु यानी शरीर ,आत्मा ,मन और इन्द्रियों के संयोग को आयु कहते हैं और जिस शास्त्र में इनका ज्ञान मिलता हैं उसे वेद या विज्ञान कहते हैं। जब देश में हिन्दीकरण का जोर चल रहा था ,तब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का नामकरण को लेकर बहुत भ्रांतियां थी ,कोई कहे इसका नाम चिकित्सा संसथान रखा जाए ,कोई शल्य संस्थान। तत्समय के सांसद पंडित शिव शर्मा जी ने सलाह दी की अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का नाम आयुर्वेद संस्थान रखा जाए तब बहुत  लोगों ने विरोध किया तब पंडित शर्मा ने समझाया चिकित्सा या शल्य से मात्र औषधि और शल्य की पूर्ती होगी और आयुर्वेद से शरीर आत्मा ,मन और इन्द्रियों की चिकित्सा होगी। इस पर कुछ संतुष्टि हुई पर आंतरिक विरोध के फलस्वरूप उसका नाम आयुर्विज्ञान रख ले। इस प्रकार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पर सहमति हुई।

आज भी स्वस्थ्य की परिभाषा अपने आप में अद्वितीय हैं। “समदोषः समाग्नि सम धातु मलाःक्रियाः ,प्रसन्ने आत्मेन्द्रियः मनः स्वस्थ्य इत्याभीयते। यानी जब शरीर में दोष ,धातु मल और अग्नि समान अवस्था में हों और इसके साथ जिनकी आत्मा ,इन्द्रिय मन स्वस्थ्य होगें तभी वह स्वस्थ्य कहलायेगा। इससे सम्पूर्ण संसथान की सार्थकता पूरी होती हैं।

संसार की प्रत्येक वस्तु औषधियां हैं इसके अलावा कुछ नहीं। इसी प्रकार जिस देश की औषधियां उसी देश के निवासियों को लाभकारी होती हैं। इसी प्रकार “रोगस्तु दोष वैश्य्म ,दोष साम्यम आरोग्यता। यानी दोषों की विषमता रोग हैं और समानावस्था    में लाना चिकित्सा हैं। आज भी आयुर्वेद चिकित्सा ग्रंथों में हजारो हजार सूत्र हाजिर हैं जिनके लिए  कोई भी अनुसन्धान /शोध की जरुरत नहीं हैं बस उनको खुले हृदय से अपनाने की जरुरत हैं।

क्या जन्म से ही कोई भी व्यक्ति बिना हमारे किचिन के जीवित रह सकता हैं। आहार हमारी चिकित्सा हैं और आहार  शब्द इतना व्यापक हैं जिसमे अन्न ,मसाले ,साग सब्जियां ,फल ,पांच महाभूत के बिना कोई जिन्दा रह सकता हैं। कदापि नहीं। आज भी इंडियन मेडिकल एसोशिएशन के सदस्य या कोई बड़ा से बाद एलॉपथी का डॉक्टर आज भी काढ़ा आदि का उपयोग कर रहे हैं। क्या अलोपथी डॉक्टर अन्न की जगह रसायन का उपयोग कर रहे हैं। मल्टीवितानिन्स ,ज़िंक ,कैल्शियम आदि  के लिए आहार दूध ,घी फल फूल का उपयोग क्यों करते हैं। विश्व में अन्न का अपना महत्व हैं। इसी प्रकार मसाले ,अन्न का उपयोग हैं।

विवाद का विषय श्रेष्ठता पर हैं। आज भी चिकित्सा सिद्धांत ,शल्य के सिद्धांत आयुर्वेद पर निर्भर करते हैं। आचार्य चरक और आचार्य सुश्रुत के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आज भी उतने कारगर हैं जैसे पहले थे। चिकित्सा का अर्थ मानव या पशुओं को रोग मुक्त करना। चिकित्सा को आप किसी भी सीमा में नहीं बाँध सकते। इसके लिए देश या दुशमन की सीमाएं छोटी पड जाती हैं।

चिकित्सा में जिस पद्धति जो जो उपयोगी ,मानवहितकारी हो उनको स्वीकारना चाहिए। कोई भी भाषा जाति,धर्म,जबतक उसको राजाश्रय प्राप्त नहीं होता तब तक फलता ,फूलता नहीं हैं। आज सरकारों के द्वारा आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को मान्यता देने से अलोपथी डॉक्टरों के पेट में दर्द होने लगा। कृमिरोग होने लगा। जबकि यह प्रसन्नता का विषय होना चाहिए की आयुर्वेद जो भूली बिसरी हो गयी थी उसे भी मान्यता मिलने लगी ,उपेक्षित नहीं रहेगी ,मुख्य धारा में आ रही हैं और सौतन नहीं रही उसे भी बराबरी का हक़ मिलने लगा। यह द्वेषता उनकी संकीर्ण मानसिकता का घोतक हैं।

सच्चाई छुप नहीं सकती कभी कागज़ के फूले से।
खुशबु आ नहीं सकती हैं ,कभी कागज़ के फूलों से
छोटा दिल दिमाग रखना बीमारी हैं
सबको आदर देना ,गले लगाना बड्डपन की निशानी हैं
कौआ के कोसने से कोई नहीं मरता
आयुर्वेद अपनी योग्यता और गुणों से ज़िंदा हैं
तुम नहीं स्वीकारोगे उससे कुछ नहीं होगा
एक से एक मिलने से ग्यारह होंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *