विचार

बुद्ध ने अपने अंतिम उपदेश में शिष्यों से कहा था कि -अपना प्रकाश खुद बनो, अर्थात “आत्मनिर्भर बनो”। -डॉ. निर्मल जैन

शिष्य आनंद उनके इस उपदेश से अत्यंत दुखी हुआ। तब बुद्ध ने कहा -मेरे पीछे पीछे कब तक चलोगे? स्वयं चलने का प्रयत्न क्यों नहीं करते? महावीर, राम, कृष्ण और गुरुनानक सबने आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनने का संदेश दिया है।

भारत को आजादी तो मिल गयी, लेकिन जब तक हम हमारी ज़रुरतो के लिए विदेशी उत्पाद पर निर्भर हैं यह पूर्ण आज़ादी नही है।

आज की विषम स्थिति में भी कुछ शक्तियां आर्थिक, व्यापारिक प्रसंगों की ओट में हम पर हावी होने की कोशिश कर रही हैं । उससे उबरने के लिए ही प्रधानमंत्री जी ने देश के लिए आत्मनिर्भर बनने पर बल दिया।

वैश्विक शक्तियां तो भारत को औद्योगिक रूप से समर्थ होने से रोकने के लिए जो भी संभव होगा अवरोध उत्पन्न करेंगी ही।

बुद्ध के शिष्य की तरह कुछ बुद्धिजीवी भी इस संदेश के अपनी-अपनी बुद्धि अनुसार अर्थ लगा भ्रमित हो रहे हैं।

आत्मनिर्भरता से तात्पर्य है कि हम विदेशी उत्पादों के बहिष्कार के बदले जहां तक संभव हो उससे बढ़िया उत्पाद बनायें। स्वदेशी ही खरीदें, जिससे देश का धन देश में ही रहे, रोजगार भी बढ़ें।

आत्म-निर्भरता दुनिया से कनेक्शन तोड़ लेना नहीं है। आत्मनिर्भरता ना तो किसी का बहिष्करण है और ना ही किसी के प्रति अलगाववादी रवैया।

जबकि समय की मांग है कि हमें न केवल औद्योगिक उत्पादों में ही आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी है अपितु भावनात्मक, बौद्धिक, तकनीकी सभी क्षेत्र में भी स्वावलंबी बनना होगा।
छोटे बच्चे को मां चलना
सिखाती है। बच्चा तब तक ही सहारा लेता है जब तक आवश्यकता होती है। उसके बाद मां अगर सहारा दे तो मना कर स्वयं ही चलने का प्रयास करता है।

आखिर अपना देश भी कब तक दूसरों की उंगली पकड़कर अपने आर्थिक, व्यापारिक क्षेत्र में वैशाखी के सहारे चलता रहेगा? एक दिन तो खुद ही चलना होगा।

अपने को समर्थ बनाने का आशय किसी से असहयोग करना नही। सहयोग एक गुणवत्ता है लेकिन दूसरों पर निर्भरता घातक है।

आत्मनिर्भरता अथवा स्वावलम्बन दोनों शब्द स्वय परिश्रम करके, संघर्ष करके अपने पैरो पर खड़े रहने की शिक्षा और प्रेरणा देने वाले शब्द है।

‘जो व्यक्ति आत्मनिर्भर न होकर दूसरों पर निर्भर रहता है, वह सबसे अधिक दुःखी व्यक्ति होता है। -गांधी जी

अत्यधिक जनसंख्या होने के कारण से हम पूरी दुनिया के लिए सिर्फ एक बाजार बनकर रह गये हैं। हमारे देश का पैसा इन देशों की बनी चीजो को खरीदने के लिए बाहर चला जाता है। देश में गरीबी बढ़ती है, उद्योगो की कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या अलग मुंहबाए खड़ी रहती है।

हमें इस दृष्टिकोण से भी अपने को स्वावलंबी बनाना है कि हर बात पर हर काम के लिए दूसरों की सलाह पर ही आश्रित न रहें। स्वयं भी समाधान खोजें। सलाह लेना अच्छी बात है। उससे भी अच्छा होता है सलाह करने से पहले खुद अपनी समझ-बूझ से काम करने की आदत डालें।

जहाँ भी जिस क्षेत्र में कुछ अच्छा करने में सक्षम हैं तो कोई गलत प्रभाव न पड़ने तक काम करते चाहिए।

लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि पूर्णतः सब कुछ खुद ही करें। लेकिन यह कदापि नहीं सोचना चाहिए कि हमारे सभी काम और लोग ही करें। जो काम हम खुद अपने लिए कर सकते हैं उस को हम खुद ही करें।

लॉक डाउन काल में अचानक ही घरेलू काम का दबाव बढ़ गया। लेकिन जो स्वाभाविक रूप से अपने निजि और घरेलू काम के प्रति क्रियाशील रहे उन्हे अन्य लोगों की तुलना में असुविधा का अहसास कम हुआ।

इसी तरह सतत अभ्यास और साधना से जिन लोगों ने अपने इष्ट देव को अपने हृदय की स्मृति पटल पर स्थापित कर लिया इस लॉकडाउन के समय दर्शन-वन्दन के लिए उन्हें फिर किसी स्थान विशेष या व्यक्ति विशेष के आलंबन की आवश्यकता नहीं रही।

अपने अंतिम प्रयास तक स्वयं में यथा संभव पूर्णता प्राप्त करना और
दूसरों पर कम से कम आश्रित होने का नाम ही तो आत्मनिर्भरता है।

डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
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