RELIGIOUS

पापों का मूलधन त्याग धर्म से समाप्त होता है – एलाचार्य अतिवीर मुनि

परम पूज्य एलाचार्य श्री 108 अतिवीर जी मुनिराज ने पर्वाधिराज दसलक्षण महापर्व के अवसर पर भारतवर्षीय दिगम्बर जैन संघ भवन, कृष्णा नगर, मथुरा में अष्टम लक्षण “उत्तम त्याग धर्म” की व्याख्या करते हुए कहा कि त्याग के बिना मनुष्य महान नहीं बनता और जब तक समस्त अंतरंग व बहिरंग परिग्रह का त्याग ना हो तब तक मोक्ष की प्राप्ति भी संभव नहीं| हमें अपने जीवन में चारों प्रकार का दान करना चाहिए और विषय-कषायों का त्याग करना चाहिए| तभी हमारा अपना मनुष्य भव सार्थक होगा| उत्तम त्याग धर्म की चर्चा जब भी चलती है, तब तब पराया दान को ही त्याग समझ लिया जाता है| त्याग के नाम पर दान के ही गीत गाये जाने लगते हैं, दान की ही प्रेरणाएं दी जाने लगती हैं| त्याग एक ऐसा धर्म है, जिसे प्राप्त कर यह आत्मा आकिंचन्य धर्म की धारी बन जाती है, पूर्ण ब्रह्म में लीन होने लगती है और सारभूत आत्मस्वभाव को प्राप्त कर लेती है|

एलाचार्य श्री ने आगे कहा कि त्याग और दान में बहुत अंतर होता है| त्याग धर्म का नाम है, जबकि दान पुण्य का नाम है| त्यागियों के पास परिग्रह नहीं होता परन्तु दानियों के पास परिग्रह पाया जाता है| त्याग स्व तथा पर दोनों का हो सकता है परन्तु दान स्वयं की वस्तु का ही होता है| त्यागी को महाराजा कहते हैं परन्तु दानी को राजा कहते हैं| दान में दो व्यक्तियों का होना जरुरी है परन्तु त्याग में दूसरे की आवश्यकता नहीं होती| दान उपयोगी वस्तु का किया जाता है परन्तु त्याग उपयोगी तथा अनुपयोगी दोनों का हो सकता है| दान में अहंकार की सम्भावना ज्यादा होती है जबकि त्याग में अहंकार नहीं होता| त्याग में वस्तु विस्मृत हो जाती है जबकि दान में वस्तु की स्मृति बानी रहती है| त्याग से पाप का मूलधन ही समाप्त हो जाता है, जबकि दान से पाप का ब्याज समाप्त होता है| गरीब व्यक्ति दान तो नहीं कर सकता परन्तु त्याग अवश्य कर सकता है और जीवन को आनंदित बना सकता है|

लालच को त्याग की चोट से तोडा जा सकता है| त्याग का अर्थ है कि त्यागी गयी वस्तु के प्रति मोह का भी अभाव कर देना और यही त्याग कर्मों की निर्जरा में कारण बन जाता है| बंधन से मुक्ति की तरफ जाने का यही सबसे सरल उपाय है| दान प्रशंसनीय है परन्तु त्याग पूजनीय होता है| जिनेन्द्र भगवान ने कहा है कि जो जीव सारे परद्रव्यों के मोह को छोड़कर संसार, देह और भोगों से उदासीन परिणाम रखता है, उसके त्याग धर्म होता है| राग के द्वारा संसार के बंधन का विकास होता है तो वीतराग भावों के द्वारा संसार से मुक्त होने के मार्ग का विकास होता है| जो वीतराग बने हैं, जिन्होनें उत्तम त्याग धर्म को अपनाया है, उनके प्रति हमारा हार्दिक अनुराग बना रहे| उनकी भक्ति, स्तुति और उनका नाम स्मरण होता रहे, यही एकमात्र संसार से बचने का सरलतम उपाय है, प्रशस्त मार्ग है|

एलाचार्य श्री ने आगे कहा कि आचार्यों ने दान, पूजा और अभिषेक को श्रावक के प्रमुख कर्तव्यों में गिना है| अतिथि सत्कार करना भी प्रत्येक श्रावक का कर्त्तव्य है| यह सभी शुभ क्रियाएं लोभ को शिथिल करने के लिए हैं| जो लोभ कर्म हमारे आत्मप्रदेशों पर मजबूती से चिपक गया है, जिससे संसारी निःश्रेयस और अभ्युदय की गति रुक गई है, उस लोभ-कर्म को तोड़ने का काम यही त्याग धर्म करता है| संसारी प्राणी अपने जीवन के बारे में ना जाने कितने तरह के कार्यक्रम बनाता है, पर अहित के कारणभूत रागद्वेष भाव को त्याग करने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाता| सांसारिक सुखों की वांछा व्यर्थ है, क्योंकि सांसारिक सुख सब कर्माधीन हैं| सांसारिक सुखों की आकांक्षा दुःख लेकर आती है और दुःख का बीज छोड़कर जाती है| ऐसे सांसारिक सुखों में निकांक्षित सम्यग्दृष्टि आस्था नहीं रखता| सम्यग्दृष्टि अर्थ (संपत्ति) में नहीं, परमार्थ में आस्था रखता है|

Leave a Reply

Your email address will not be published.