विचार

जो पाप बांटते समय किसी की नहीं सुनता, “भोगते” समय भी कोई उस की नहीं सुनता -डॉ. निर्मल जैन

विंस्टन चर्चिल एक पागलखाने में व्यवस्था देखने गए। वहां एक पागल कागज पर कुछ लिख रहा था। चर्चिल ने उससे पूछा, ‘क्या लिख रहे हो?’ पागल थोड़ा गुस्से में बोला, ‘अंधे हो? देखते नहीं खत लिख रहा हूं।’ चर्चिल ने फिर पूछा, ‘किसे लिख रहे हो?’ उसने कहा,’अपने आप को लिख रहा हूं।’ ‘क्या लिख रहे हो?’ चर्चिल ने पूछा। जवाब मिला, ‘अभी कैसे बता सकता हूं? लिखने के बाद डाक में डालूंगा। फिर जब यह मुझे मिलेगा तब पढ़ने के बाद पता चलेगा कि खत में क्या लिखा है?’

उस पागल की इस मासूम बात में जीवन का पूरा दर्शन छिपा हुआ है। हम आज जो कुछ भी कर रहे हैं, वह आज अभी नहीं, पर आखिर में जब लौट कर हमारे पास आएगा, तभी हम उसे पढ़ सकेंगे। और तभी हमें एहसास हो सकेगा कि हमने बीते जीवन में क्या कुछ किया? अपने लिए कर्म ही करते रहे या अपने कर्तव्यों ओ भी पूरा किया अच्छा काम किया या बुरा? कर्म वो है जो कुछ भी हम करते हैं, वो हमारी जीविका से संबंधित भी हो सकता है और नहीं भी। वहीं कर्तव्य वो है, जो हमें करना चाहिए, जो समाज के हित के साथ-साथ धर्महित में भी हो।

अक्सर हम सभी अपने हाथों में अपनी जीवन रेखा देखते हैं। लेकिन हमारा जीवन रेखा के साथ एक वृत्त या सर्किल भी है। रेखा इसलिए कि उसका शुरू होने वाला छोर तो हमें दिखता है, लेकिन दूसरा छोर कहां है और कितना लंबा है, यह हम नहीं जानते। क्रिकेट में 99 रन बनाने के बाद अच्छे से अच्छा बैट्समैन भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि वह ‘सेंचुरी’ बना ही लेगा। इसी तरह हम सभी यह तो जानते हैं कि हमने अपनी आयु के इतने वर्ष जी लिए, पर कितने चौके-छक्के अभी और लगाएंगे किसी को नहीं पता। हो सकता है अगली बॉल या पल पर ही ‘कैच’ कर लिए जाएं।

हम अपने जीवन के प्रारंभ में जो कुछ भी अपने लिए, दूसरों के लिए या कहिए कि पूरी मानव जाति और प्रकृति के लिए करते हैं, वह परिक्रमा करता हुआ अंत में सुख-दुख के रूप में, हानि-लाभ के रूप में हमारे ही पास आता है। अंत में हम ही अपने उस लिखे को पढ़ते-भोगते हैं, जो हमने जीवन भर लिखा-किया होता है।

जब यह निश्चित है कि , वह सब हम तक ही लौट कर आएगा, तब हम प्रकृति की विवेकवान सर्वश्रेष्ठ रचना होकर भी अपने जीवन के उजले कागज पर दूसरों के लिए छल, कपट, अपमान, अनाचार क्यों लिखें, जो बाद में पढ़ते समय हमें कष्ट दे? ऐसी फसल क्यों बोयें जिसे काटते समय हमारे ही हाथ लहू-लुहान होने लगें। अपने छोटे-छोटे स्वार्थ, अपने अहं को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर क्योंकर हम अपने मित्रों, अपने वरिष्ठ जनों को यथोचित मान सम्मान नहीं देते।

जबकि हर कोई यह जानता है हमारी वाणी और व्यवहार ही हमारे पारिवारिक संस्कारों को प्रदर्शित करती है। इसलिए जीवन की भाषा और ‘कलेवर’ को ऐसा सरल, स्वच्छ, व्यवस्थित और हल्का-फुल्का रखें कि जीवन यात्रा  के हर पड़ाव पर सहयात्री कह उठें कि – आपसे मिलकर बड़ा अच्छा लगा।

व्यक्ति अपना कल्याण स्वयं करता है। कोई दूसरा व्यक्ति उसका कल्याण नहीं कर सकता। प्राणी हंसते हंसते कर्म बांधता है, भोगते समय रोते-रोते भी छुटकारा नहीं मिलता। कर्म, कर्ता का अनुसरण करता है। जो पाप बांटते समय किसी की नहीं सुनता तो भोगते  समय भी कोई उस की नहीं सुनता। अच्छे कार्य करते रहिए, दूसरों से शुभकामनाएँ प्राप्त करते रहिए, यही कर्म के नियम का समाधान है।

डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
डॉ. निर्मल जैन (ret.जज)
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