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जीवन को बिना चालक का वाहन न बनाएँ – डॉ. निर्मल जैन

महानगर की एक पॉश कालोनी के एक आलीशान महलनुमा भवन से बाहर आकर वो भारी-भरकम धनी महिला अपनी नई शानदार चमचमाती कार में बैठ ड्राइवर के साथ ड्राइव पर निकली। कुछ दूर चलने पर उसे अपनी दो फ्रेंड दिखाई दीं। उन्हे एक साथ देख कर उस महिला की बाछें खिल गईं। वह अपनी कार के प्रदर्शन का यह स्वर्णिम मौका छोड़ना नहीं चाहती थी।  ड्राईवर से कार रुकवाकर सहेलियों में से एक को अपने साथ पीछे की सीट पर और दूसरी को ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठा लिया। कार कुछ ही आगे चली थी कि उसे लंबे चौड़े कद काठी  वाली दूर के रिश्ते की बहन नजर आ गई। उसने उसे भी बैठाने को कहा। ड्राइवर ने संकोच से कहा-‘मैडम यह एडजस्ट नहीं हो पाएंगी।’

महिला की ज़िद थी इसलिए  जैसे-तैसे उसे भी पीछे की सीट पर टिका दिया गया। संयोग ऐसा बना कि उस दिन महिला को अपनी कार दिखाने का पूरा अवसर मिलना था। थोड़ा आगे चलते ही महिला ने कार रुकवा कर भारी थैले लटकाए जा रही अपनी पड़ोसन को भी कार में बैठने को आमंत्रित कर लिया। ड्राइवर बोला- ‘मैडम कार में पहले से चार लोग बैठे हैं। अब ये कहां बैठ पाएंगी?

लेकिन यह कैसे हो सकता था कि पड़ोसन को कीमती कार न दिखाई जाए? महिला ने गुस्से में ड्राइवर से कहा- कार में जगह नहीं है तो तुम उतर जाओ और अपनी सीट पर उन्हें बिठाओ। ड्राइवर कार से बाहर उतर गया। महिला की पड़ोसन ने उसकी सीट पर बैठ कर कार की बहुत तारीफ की। लेकिन ड्राइवर के उतर जाने के बाद कार वहीं खड़ी हो गई और कोई भी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाया।
इन दिनों हम भी उस कार-मालकिन की तरह होते जा रहे हैं। बस अपने वैभव और ऐश्वर्य के प्रदर्शन में ही लीन रहते हैं। अपने हृदय रूपी जीवन-रथ में रथ की सामर्थ्य, क्षमता को न आंकते हुए उसमें भौतिक सामग्री -मान,माया,मोह के काठ-कबाड़ की इतनी ओवरलोडिंग कर रहे हैं कि हमने ड्राइवर (परमात्मा) के लिए भी कोई जगह नहीं छोड़ी। उसको भी बाहर कर दिया है। दुनियादारी के मायाजाल में फंसकर इन दिनों हमारी श्रद्धा परमात्मा से हटकर धन और दिखावे के प्रति अधिक हो गई है। भगवान को अपने हृदय में रखने का हमारा कोई प्रयास रहता ही नहीं है।

यह अजीब विरोधाभास है कि राम और रावण के बीच में हम राम को पसंद करने वालों की चाहत कैसे और क्यों पैसे और परमात्मा में से पैसे के प्रति अधिक हो गई है? यह जानते हुए भी कि पैसा केवल जिंदगी के साथ तक ही है और यह भी कोई गारंटी नहीं कि जीवन में साथ रहते हुए हमें खुशी दे ही दे। जबकि शाश्वत आनंद देने वाला भगवान जिंदगी में भी साथ है और जिंदगी के बाद भी साथ है।

जो भगवान हमारे दिल में होना चाहिए था, उसे हमने जीभ पर रख लिया है। और जो पैसा हमारी जीभ पर, केवल हमारे उपयोग के लिए होना चाहिए उस पैसे को हमने अपने हृदय के सिंहासन पर विराजमान कर लिया है। जिस तरह हम मौत को स्वीकार करते हुए बेहतर जीवन की कामना करते हैं, स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहते हैं उसी तरह हमें अपनी प्राथमिकताओं को भी तय करना होगा।

सुविधा देने वाले पदार्थ हमारे सेवक होते हैं और हम हैं कि स्वयं उनकी सेवा में लग जाते हैं। जरूरतें पूरी करें, सुविधाएं भी जुटाएँ। लेकिन सदैव इतना ध्यान अवश्य रहे कि जीवन की गाड़ी में सबको उचित स्थान दे दें लेकिन भूलकर भी ड्राइवर की सीट से (भगवान) को न हटाएं। नहीं तो यह जीवन-रथ मंजिल पर न पहुंच कर ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर ही हिचकोले खाता रहेगा।  

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