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गुरु जो देते हैं वो सारी दुनिया नहीं दे सकती है : मुनिश्री विनम्रसागर जी

 

मुनिसंघ के सानिध्य में श्रद्धापूर्वक मनाया गुरुपूर्णिमा महोत्सव

खातेगाव : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विनम्रसागरजी महाराज सहित नौ मुनिराजों के सानिध्य में जैन धर्मशाला में सोमवार को गुरुपूर्णिमा महोत्सव मनाया गया। मुनिश्री ओंकारसागरजी ने कहा कि जो कठोर को नरम और गरम को ठंडा बना देते हैं उनका नाम गुरु है। अगर गुरु का हाथ सिर पर हैं तो हम किसी भी प्रकार की ऊंचाई को पा सकते हैं। गुरु ही सत्य है, गुरु ही तत्व है। गुरु आज्ञा ही जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है।

मुनिश्री निस्वार्थसागरजी एवं मुनिश्री निर्भीकसागरजी महाराज ने भी गुरु की महिमा बताई।

मुनिश्री विनम्रसागरजी महाराज ने गुरु के महत्व पर कहा कि संपूर्ण विश्व में गुरु का एक सम्मानजनक स्थान है, लेकिन भारत में गुरु को भगवान का रूप है माना जाता है। गुरु-शिष्य का रिश्ता अमर होता है।

गुरु ही शिष्य के अंतर में उतरकर शिष्य के संसार भ्रमण का अंत कराकर निज शाश्वत चेतना का वरण कराते है। गुरु जो देते है वह सारी दुनिया मिलकर भी नहीं दे सकती। गुरु के नाम जपने से ही शिष्य का कल्याण हो जाता है। गुरु-शिष्य के संबंध को किसी की उपमा नहीं दी जा सकती। वह तो अनमोल है, अमर है। गुरु अपने शिष्य को हर संकट से उभारते है। हर परिस्थिति में उसकी रक्षा करते है। इसलिए शिष्य गुरु चरणों मे अपना जीवन समर्पित कर निश्चिन्त हो जाता है।

विद्यासागर महाराज आज सारे विश्व के गुरु के रूप में माने और पूजे जाते है

पंचमयुग के सर्वश्रेष्ठ गुरु विश्ववंदनीय संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज है। जो आज सारे विश्व के गुरु के रूप में माने और पूजे जाते है। सैकड़ों मुनिराज, आर्यिकाएं, ब्रह्मचारी भाई-बहनं जो उनकी वीतराग छवि को निहारकर चल पड़े। घर द्वार छोड़ उनके जैसा बनने के लिए निकले, जो स्वयं चिद्रूप चैतन्य बने और अनेक चैतन्य कृतियों का सृजन करते गए, जो आज भी अनवरत जारी है।
संकलन अभिषेक जैन लूहाडीया रामगंजमंडी

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